अजागरूकता को भी स्वीकारें

भाग दो · ध्यान का विज्ञान · 3. मुक्ति के लिए दिशानिर्देश

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भाग दो · ध्यान का विज्ञान · 3. मुक्ति के लिए दिशानिर्देश

अजागरूकता को भी स्वीकारें

जागरूकता में शिखर और घाटियाँ आती हैं; भूल जाना अपने-आप में असफलता नहीं है।

पुस्तक पढ़ें3. मुक्ति के लिए दिशानिर्देश

यह अध्याय क्या कहता है

पुस्तक लगातार चौबीस घंटे तनावपूर्ण सजगता की मांग नहीं करती। जागरूकता के बाद विश्राम आता है, फिर नई ताजगी के साथ जागरूकता लौटती है।

पुस्तक की छवि

दिन और रात, शिखर और घाटी की छवि बताती है कि दोनों जीवन का हिस्सा हैं। यदि आप केवल “सजग अवस्था” से चिपकेंगे तो वही नई चिंता बन सकती है।

अभ्यास के लिए इसका अर्थ

आनंद या दुख, जागरूकता या भूल—दोनों को देखकर जो जान रहा है, वह उनसे बड़ा है। अभ्यास भूलने को भी देखने में बदल देता है।

जब मन भटक जाए
  1. भटकाव देखकर स्वयं को दोष न दें।
  2. जिस क्षण याद आए, उसी क्षण को लौटने का द्वार मानें।
  3. जागरूकता को कसाव नहीं, ताजगी और विश्राम से जोड़ें।