भाग एक · ध्यान के बारे में · 2. ध्यान का खिलना
महान मौन
मौन केवल बाहर आवाज़ न होने का नाम नहीं; वह भीतर का ऐसा आकाश है जो आसपास के परिवर्तन से मूलतः विचलित नहीं होता।
यह अध्याय क्या कहता है
बाहरी शांति में ध्वनि कम हो सकती है, पर भीतर विचार चल सकते हैं। पुस्तक जिस मौन की बात करती है वह सकारात्मक उपस्थिति है—रिक्तता नहीं, बल्कि गहराई।
पुस्तक की छवि
उसकी छवि बवंडर के शांत केंद्र जैसी है। बाहर मौसम, उम्र, घटना और आवाज़ बदलते हैं; केंद्र में एक ऐसी जगह है जिसे वे छू नहीं पाते।
अभ्यास के लिए इसका अर्थ
मौन को पैदा करने की कोशिश न करें। शरीर और मन के शोर को देखते-देखते कभी उस पृष्ठभूमि का स्वाद मिलता है जो पहले से मौजूद है।
पठन-स्मरण
- शोर से लड़ने के बजाय उसके पीछे की जगह को सुनें।
- कुछ क्षण बाहरी ध्वनि और भीतर के मौन को एक साथ जानें।
- मौन को “मेरी उपलब्धि” बनाकर पकड़ें नहीं।