शुरुआत में प्रयास

भाग दो · ध्यान का विज्ञान · 1. विधियाँ और ध्यान

← इस भाग पर वापस जाएँ
भाग दो · ध्यान का विज्ञान · 1. विधियाँ और ध्यान

शुरुआत में प्रयास

शुरुआत में “करना” होता है, पर विधि परिपक्व होने पर प्रयास धीरे-धीरे अकर्म में बदलना चाहिए।

पुस्तक पढ़ें1. विधियाँ और ध्यान

यह अध्याय क्या कहता है

प्रारंभ में बैठना, श्वास देखना या कोई सक्रिय चरण करना प्रयास जैसा लगेगा। मन को दिशा देने के लिए यह आरंभिक श्रम स्वाभाविक है।

पुस्तक का मोड़

पुस्तक का मोड़ यह है कि लक्ष्य अधिक से अधिक प्रयास नहीं। सफल अभ्यास उस बिंदु की ओर ले जाता है जहाँ जागरूकता श्वास जैसी सहज हो और “मैं कर रहा हूँ” ढीला पड़े।

अभ्यास के लिए इसका अर्थ

इसलिए प्रयास करें, पर प्रयास को स्थायी आदत न बनाएँ। समय-समय पर देखें कि क्या विधि अब अपने-आप चल सकती है और आप केवल साक्षी रह सकते हैं।

अभ्यास-स्मरण
  1. शुरुआत में अनुशासन रखें, कठोरता नहीं।
  2. जब सहजता आए तो अनावश्यक प्रयास कम करें।
  3. अकर्म को आलस्य न समझें; जागरूक विश्राम और बेहोशी अलग हैं।