आनापानसति योग ध्यान

श्वास भीतर, श्वास बाहर, और जागरूकता

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भाग तीन · अध्याय 7 · श्वास—ध्यान का सेतु

आनापानसति योग ध्यान

बुद्ध ने स्वाभाविक श्वास को जागरूकता के द्वार की तरह उपयोग किया। श्वास को बल न दें; हर भीतर जाती और बाहर आती श्वास के साथ रहें, और जागरूकता को धीरे-धीरे ध्वनियों तथा पूरे अस्तित्व तक फैलने दें।

निष्क्रिय ध्यानश्वासमूल: जागरूकता
इस ध्यान को कैसे शुरू करें?

पहले सभी चरण एक बार पढ़ लें। वास्तविक ध्यान के समय अभ्यास ऑडियो चलाएँ; इंटरनेट के बिना अभ्यास करना हो तो पहले फोन में डाउनलोड कर लें।

अभ्यास की शैली

चरण 1

श्वास का अनुसरण करें

श्वास को सहज, गहरी और तनाव-रहित रहने दें। जानें कि कब श्वास भीतर आ रही है और कब बाहर जा रही है; कोई पूरी श्वास बेहोशी में न गुजरने दें।

चरण 2

ध्वनियों को भी जागरूकता में शामिल करें

श्वास को देखते हुए आसपास की ध्वनियाँ सुनें। उन्हें बाधा न मानें, उनसे लड़ें नहीं और उनके पीछे भी न जाएँ।

चरण 3

'मैं कर रहा हूँ' को छोड़ें

श्वास और ध्वनि चलती रहें, पर व्यक्तिगत केंद्र धीरे-धीरे ढीला पड़े। जैसे बूंद सागर में मिलती है, वैसे केवल अस्तित्व का अनुभव रहने दें।

चरण 4

अंत में साक्षीभाव बनाए रखें

अनुभव का तुरंत विश्लेषण न करें। कुछ देर बैठें; यदि रात में अभ्यास हो तो सीधे नींद में जाएँ और जागरूकता को कोमल बने रहने दें।

दिशा फिर भी साक्षीभाव ही है
निष्क्रिय का अर्थ सुस्ती या विचारों को दबाना नहीं। शरीर, श्वास, ध्वनि और विचार जैसे हैं वैसे आने दें और जागरूक रहें।

ध्यान शुरू करें · अभ्यास ऑडियो

इसे वास्तविक अभ्यास के दौरान उपयोग करें। ऑडियो को पूरी प्रक्रिया का समय और क्रम संभालने दें ताकि फोन बार-बार न देखना पड़े।