भाग पाँच · गुरु से प्रश्न · 12. साक्षीभाव पर्याप्त है
साक्षीभाव पर्याप्त है
लाखों वर्षों की आदतों के सामने “बस साक्षी रहो” बहुत सरल लग सकता है, फिर भी पुस्तक सभी विधियों को अंततः इसी केंद्र पर लौटाती है।
प्रश्न क्या है?
प्रश्न है: इतना जटिल और अनियंत्रित मन केवल देखने से कैसे बदल सकता है? क्या इसके साथ और कुछ करना आवश्यक नहीं?
पुस्तक का दीपक-रूपक
पुस्तक दीपक और अंधकार की छवि देती है। प्रकाश लाने के बाद अंधकार हटाने के लिए दूसरी क्रिया की जरूरत नहीं होती; उसी तरह जागरूकता उपस्थित हो तो मन की यांत्रिकता अपना बल खोती है।
पुस्तक कैसे फिर केंद्र पर लौटती है
एक सौ बारह विधियों के बाहरी रूप अलग हो सकते हैं, पर उनका जीवंत केंद्र साक्षीभाव है। साधना का चक्र वहीं पूरा होता है: विधि से जागरूकता, जागरूकता से सहजता।
एक काम कम करें: मन से दूसरा युद्ध न शुरू करें
- विचार आए तो उसे दबाने या सुधारने की दूसरी लड़ाई न बनाएँ।
- पहले उसे साफ़-साफ़ देखें।
- देखना पर्याप्त गहरा हो तो अगला कदम अक्सर स्वयं स्पष्ट हो जाता है।